पंखा रोड

Friday, April 10, 2009

पानी

पानी रे पानी तेरा रंग देखा
पानी की पहचान बोतल और टैंकरों में सिमटती जा रही है। होना यही है कि जिसके पास पैसा है, पानी उसका। घर से बाहर निकलकर आप बस स्टॉप, बस अड्डा, बाजार, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डा, शापिंग माल, सिनेमा हाल, सरकारी-गैरसरकारी दफ्तर या जहां कहीं भी जाएं राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की पानी की बोतलें मिलेंगी या ठंडे पेय की बोतलें। इनके लिए पानी है जिसके लिए आपको अच्छी खासी रकम चुकानी पड़ती है।

फ़ोटो: 500 मिली. की पानी की बोतल मात्र २५ रुपये में!
आजकल पानी एक चर्चा का विषय बन चुका है। पीने योग्य पानी यानी पेय जल को लेकर पूरी दुनिया में चिन्ता पसरी हुई है। कहा यह भी जा रहा है कि अगला विश्व हुआ तो वह पानी को लेकर ही होगा। यह स्थिति तब है जब धरती का लगभग 71 प्रतिशत भाग पानी से भरा हुआ है। गांव हो या शहर सभी जगह पानी की परेशानी दिखाई देती है। पानी को लेकर एक परेशानी उसके प्रदूषित होने से भी है। विश्व के कुल पानी का लगभग 97 प्रतिशत समुद्री पानी है जो पीने लायक नहीं है।
पेय जल के रूप में उपयोग किया जा सकने वाला नदियों, झीलों, तालाबों आदि के अलावा वर्फ के रूप में मौजूद और भूमिगत जल है। सिंचाई में पानी का एक बड़ा भाग प्रयुक्त होता है। इसके अलावा विभिन्न उद्योगों और अनेक अन्य कार्यों में भी काफी मात्रा में पानी काम का उपयोग होता है। पानी और उसके उपयोग-दुरुपयोग के अलावा इसके निरन्तर प्रदूषित होते जाने को लेकर अब अनेक समस्याएं उत्पन्न हो गयी हैं जो विश्व व्यापी हैं। दूसरी बड़ी समस्या है विभिन्न स्थानों पर पानी की उपलब्धता में भारी अन्तर का होना। हमारे देश में भी पानी की असमान उपलब्धता मौजूद है। कहीं पानी अच्छी मात्रा में उपलब्ध है तो कहीं पानी की बेहद कमी है।
गर्मी के मौसम में अधिकांश जल स्रोत सूख जाते हैं। फलस्वरूप जल संकट गहरा जाता है। पानी के बंटवारे को लेकर राज्यों में तकरार शुरू हो जाती है। देश की नदियों को परस्पर जोड़कर जल की असमानता की समस्या का हल निकालने के लिए सन् 1952 में नेशनल वाटर ग्रिड की स्थापना की गयी। पर यह योजना सफल नहीं हो सकी। कुछ साल पहले भी नदियों को जोड़ने की योजना तैयार हुई पर यह भी अभी तक सिरे नहीं चढ़ी है।
अनुमान है कि कुछ समय में ही ऐसी स्थिति हो जाएगी कि विश्व के लगभग 40 देशों में पानी का भारी संकट उत्पन्न हो जाएगा। आज भी हमारे यहां अधिकांश क्षेत्रों में जरूरत से काफी कम मात्रा में लोगों को पानी मिल पा रहा है। गांव हो या शहर कमोवेश एक जैसी ही स्थिति देखने को मिलती है। बढ़ती जनसंख्या और बढ़ती जरूरत के अनुपात में पानी की उपलब्धता घटती जा रही है। बदलते मौसम के मिजाज के लिए लोगों का आचरण भी कम जिम्मेदार नहीं है। बढ़ते प्रदूषण ने समस्या को और बढ़ा दिया है। बढ़ते शहरीकरण और औद्योगीकरण ने भी नकारात्मक भूमिका ही निभायी है। अधिकांश स्थानों पर बढ़ते जमीनी प्रदूषण के चलते पानी पीने योग्य नहीं रह गया है।
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक, पंजाब, तमिलनाडु आदि राज्यों के अनेक क्षेत्रों में आज नहीं तो कल जल संकट उत्पन्न होना ही है। नदियों का यह हाल है कि उनमें कारखानों के करोड़ों लीटर दूषित पानी को बहा दिया जाता है। शहर-कस्बों के नाले नदियों में गिर रहे हैं। अनेक नदियां ऐसी हो गयी हैं कि उनका पानी पीने की बात छोड़िए नहाने लायक भी नहीं रह गया है।
पानी की दोषपूर्ण वितरण व्यवस्था, रिसाव आदि के चलते नियमित रूप से काफी बरबादी होती है। वितरण व्यवस्था में सही बदलाव लाकर सुधार करने में खर्च भी काफी होगा। दशकों पुरानी पाइप लाइनों को बदलना आसान काम नहीं है। स्थानीय स्तर पर पानी की व्यवस्था करने के लिए प्रयुक्त होने वाला जमीनी पानी अब जमीन के काफी नीचे पहुंच गया है। जिन स्थनों पर मात्र 1 दशक पहले 40-45 फुट गहराई में पानी उपलब्ध था, वहीं अब लगभग 200 फुट खोदने पर भी पानी नहीं मिलता। यही नहीं गुजरात में कच्छ क्षेत्र में खोदे गये 10 में से 6 नलकूपों में 1200 फुट जमीन के नीचे भी पानी नहीं मिला। अनेक नगरों में स्थानीय प्राशासन द्वारा लगाए गये हैंडपम्प बेकार हो चुके हैं। पानी को लेकर परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। जगह-जगह ट्रेनों और टैंकरों से पानी पहुचाना पड़ रहा है। यही व्यवस्था राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों के करीब 128 गांवों के निवासियों के लिए जीवनदायिनी बनी हुई है।
देश के अनेक भाग ऐसे हैं जिनमें कुछ में जल्दी ही और कुछ क्षेत्रों में थोड़े वर्षों में ही पानी की उपलब्धता न के बराबर हो जाएगी। ऐसा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक, पंजाब, तमिलनाडु आदि राज्यों के अनेक क्षेत्रों में आज नहीं तो कल जल संकट उत्पन्न होना ही है। नदियों का यह हाल है कि उनमें कारखानों के करोड़ों लीटर दूषित पानी को बहा दिया जाता है। शहर-कस्बों के नाले नदियों में गिर रहे हैं। अनेक नदियां ऐसी हो गयी हैं कि उनका पानी पीने की बात छोड़िए नहाने लायक भी नहीं रह गया है। बढ़ती शराब की खपत के कारण अधिक शराब बनायी जाती है। सरकारों को टैक्स मिलता है, निर्माता जमकर धन कमाते हैं। पर शराब निर्माण के दौरान प्रयुक्त हुआ पानी प्रायः पास की नदी में बहा दिया जाता है। यही हाल कपड़ों की रंगाई फैक्टरियों, टैनरिओं और अन्य उद्योगों का है। सिर्फ नियम-कानून बनाने से सब ठीक नहीं हो जाता। उन पर अमल करने-कराने की इच्छाशक्ति भी सम्बन्धित व्यक्तियों में होना जरूरी है।
प्राकृतिक जलस्रोत सूखते जा रहे हैं और नष्ट किये जा रहे हैं। उन स्थानों की ज़मीन का उपयोग रिहायशी और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। बहुमंजिले भवन खेतों, जंगलों और हरियाली को निगलते जा रहे हैं। धन्नासेठ और भ्रष्ट लोग सड़क किनारे की और अन्य उपजाऊ जमीन खरीदकर अपना कब्जा किए जा रहे हैं।
पानी की पहचान बोतल और टैंकरों में सिमटती जा रही है। होना यही है कि जिसके पास पैसा है, पानी उसका। घर से बाहर निकलकर आप बस स्टॉप, बस अड्डा, बाजार, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डा, शापिंग माल, सिनेमा हाल, सरकारी-गैरसरकारी दफ्तर या जहां कहीं भी जाएं राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की पानी की बोतलें मिलेंगी या ठंडे पेय की बोतलें। इनके लिए पानी है जिसके लिए आपको अच्छी खासी रकम चुकानी पड़ती है। भूल जाइए कि स्थानीय प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थाएं और समर्थ लोग आपके लिए प्याऊ बनवाकर मुफ्त पानी उपलब्ध कराकर आपकी प्यास बुझाएंगे। पशु-पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था करने का पुण्य अब कितने लोग कमा रहे हैं, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। बचीखुची प्याऊ भी कुछ समय बाद गायब हो जाएंगी। पानी की बोतल सम्बन्धित कम्पनी के प्रचार से बनी छवि के अनुरूप आपक व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण अंग बनती जा रही है।
आज एक फलताफूलता व्यवसाय है। मोटे मुनाफे को देख इस क्षेत्र में हर लल्लूपंजू कूद पड़ा है। प्रकृति प्रदत्त जल की मुफ्त उपलब्धता आमजन के लिए दूभर होती जा रही है। पानी का व्यवसाय विश्व के लगभग 130 देशों में जमकर हो रहा है। यही नही, झील, तालाब और जमीनी पानी सब इन धंधेबाजों के कब्जे में है और सम्भावना भी यही है कि आने वाले समय में पूरी तरह इन्हीं के कब्जे में हो जाएगा। जल की आपर्ति से अधिक उसकी आवश्यकता है। सम्पन्न लोग विभिन्न कार्यों में पानी की आवश्यकता से कहीं अधिक खपत करते हैं। यह सीधेसीधे पानी का दुरुपयोग है।
पानी का संकट विश्व व्यापी है। इसके लिए जिम्मेदार भी हमारा आचरण ही है। असीम गंदगी फैलाने के बाद नदी-तालाबों की सफाई की ओर ध्यान दिया जा रहा है पर इसमें भी कर्त्तव्य के स्थान पर धंधा शामिल है। सैकड़ों करोड़ के खर्च के बाद भी नतीजा वही ढाक के तीन पात बना रहता है। फिर नयी योजनाएं बनती हैं, कर्ज लिया जाता है पर कुछ उल्लेखनीय नहीं हो पाता। आमजन वोट देने के बाद अपनी भूमिका से निवृत हो जाता है। इसके बाद हमारे जनप्रतिनिधि अपनी भूमिका यदि सही ढंग से निभाएं तो स्थिति में काफी बदलाव आ सकता है। यह सर्वविदित है कि स्वार्थ और धन के लालच से अपने कर्त्तव्य से विचलित होने में कितनी देर लगती है!
सहयात्रा
• टी.सी. चन्दर




3 comments:

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

MAYUR said...

अच्छा लिखा है आपने , इसी तरह अपने विचारों से हमें अवगत करते रहे , हमें भी उर्जा मिलेगी

धन्यवाद
मयूर
अपनी अपनी डगर

Kavyadhara said...

Saamne kuch peeche kuch aur kaha karte hain,
Is Shahar me bahurupiye raha karte hain.

Bas kisi tarah se apna bhala ho jaaye,
isi wazah se log auro ka bura karte hain.

Jinke bas me nahi hota bulandiyaa choona
fikre wo auron ki fatah par kasa karte hain.

Roshni jitna dabaoge aur baahar aayegi
kahi haathon ke ghere se samundar rooka karte hain
@Kavi Deepak Sharma
http://www.kavideepaksharma.co.in

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

श्री सनातन धर्म महिला समिति,
चाणक्य प्लेस, नयी दिल्ली द्वारा
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव २०१० का
१२वां भव्य आयोजन
आयोजक: श्रीमती मन्जू गोपालन

दीवाली धूम Deewalee Dhoom

कार्टूनपन्ना में देखें

स्लाइड शो

पंखा रोड